कहीं दूर जब दिन ढल जाए

कहीं दूर जब दिन ढल जाए
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए
मेरे ख़यालों के आँगन में
कोई सपनों के दीप जलाएदीप जलाए
कहीं दूर ...

कभी यूँहींजब हुईंबोझल साँसें
भर आई बैठे बैठेजब यूँ ही आँखें
तभी मचल केप्यार से चल के
छुए कोई मुझे पर नज़र न आएनज़र न आए
कहीं दूर ...

कहीं तो येदिल कभीमिल नहीं पाते
कहीं से निकल आएजनमों के नाते
घनी थी उलझनबैरी अपना मन
अपना ही होके सहे दर्द परायेदर्द पराये
कहीं दूर ...

दिल जानेमेरे सारेभेद ये गहरे
खो गए कैसे मेरेसपने सुनहरे
ये मेरे सपनेयही तो हैं अपने
मुझसे जुदा न होंगे इनके ये सायेइनके ये साये
कहीं दूर ...



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